नानापरिमळ दूर्वा — गणपति आरती
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रचनाकार - गोसावी नंदन उर्फ मोरया गोसावी
नानापरिमळ दूर्वा शमिपत्रें ।
लाडू मोदक अन्नें परिपूरित पातें ।
ऐसें पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रें ।
अष्टहि सिद्धी नवनिधि देसी क्षणमात्रें ॥१॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती
तुझे गुण वर्णाया मज कैंची स्फूर्ती ॥ ध्रु० ॥
तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती ।
त्यांची सकलहि पापें विघ्नेंही हरती ॥
वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती ।
सर्वहि पावुनि अंती भवसागर तरती ॥ जय देव० ॥ २ ॥
शरणागत सर्वस्वे भजती तव चरणीं ।
कीर्ति तयांची राहे जोंवर शाशितरणी ॥
त्रैयोक्यों ते विजयी अद्भुत हे करणी ।
गोसावीनंदन रत नामस्मरणीम ॥जय देव० ॥ २ ॥
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