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पारंपरिक पाठ

आरती एकनाथाची

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आरती एकनाथा महाराजा समर्था । त्रिभुवनि तुचि थोर जगद्गुरु जगन्नाथा ॥ध्रु॥

एकनाथ नाम सार वेद शास्त्राचे गुज । सन्सार दु:ख नासे महामन्त्राचे बीज ॥१॥

एकनाथ नाम घेता सुख वातले चित्ता । अनन्त गोपालदासा धनी न पुरे गाता ॥२॥

स्रोत, लाइसेंस और पाठ सूचना

आरती — mr.wikibooks.org contributors

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पारंपरिक पाठांतर हो सकते हैं। विशेषज्ञ पाठ और भाषा समीक्षा अभी लंबित है। पाठ में आए कथन भक्ति परंपरा का भाग हैं; स्वास्थ्य, धन या अन्य परिणाम की गारंटी नहीं हैं।

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