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विष्णु और कृष्ण

पाण्डुरङ्गाष्टकम्

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पांडुरंगाष्टकम् विष्णुस्तोत्राणि [[लेखकः :|]]

महायोगपीठे तटे भीमरथ्या

वरं पुण्डरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः ।

समागत्य निष्ठन्तमानंदकंदं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ १ ॥

तटिद्वाससं नीलमेघावभासं

रमामंदिरं सुंदरं चित्प्रकाशम् ।

वरं त्विष्टकायां समन्यस्तपादं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ २ ॥

प्रमाणं भवाब्धेरिदं मामकानां

नितम्बः कराभ्यां धृतो येन तस्मात् ।

विधातुर्वसत्यै धृतो नाभिकोशः

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ३ ॥

स्फुरत्कौस्तुभालङ्कृतं कण्ठदेशे

श्रिया जुष्टकेयूरकं श्रीनिवासम् ।

शिवं शांतमीड्यं वरं लोकपालं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ४ ॥

शरच्चंद्रबिंबाननं चारुहासं

लसत्कुण्डलाक्रांतगण्डस्थलांतम् ।

जपारागबिंबाधरं क~जनेत्रं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम॥ ५ ॥

किरीटोज्वलत्सर्वदिक्प्रांतभागं

सुरैरर्चितं दिव्यरत्नैरनर्घैः ।

त्रिभङ्गाकृतिं बर्हमाल्यावतंसं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम॥ ६ ॥

विभुं वेणुनादं चरंतं दुरंतं

स्wअयं लीलया गोपवेषं दधानम् ।

गवां बृन्दकानन्ददं चारुहासं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ७ ॥

अजं रुक्मिणीप्राणसञ्जीवनं तं

परं धाम कैवल्यमेकं तुरीयम् ।

प्रसन्नं प्रपन्नार्तिहं देवदेवं

परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ८ ॥

स्तवं पाण्डुरंगस्य वै पुण्यदं ये

पठन्त्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् ।

भवांभोनिधिं ते वितीर्त्वान्तकाले

हरेरालयं शाश्वतं प्राप्नुवन्ति ॥ ९ ॥

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौपाण्डुरङ्गाष्टकं संपूर्णम् ॥

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