श्रीरघुनाथाष्टकम्
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श्रीरघुनाथाष्टकम् रामस्तोत्राणि [[लेखकः :|]]
श्रीरघुनाथाष्टकम्
श्री गणेशाय नमः ।
शुनासीराधीशैरवनितलज्ञप्तीडितगुणं
प्रकृत्याऽजं जातं तपनकुलचण्डांशुमपरम् ।
सिते वृद्धिं ताराधिपतिमिव यन्तं निजगृहे
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ १॥
निहन्तारं शैवं धनुरिव इवेक्षुं नृपगणे
पथि ज्याकृष्टेन प्रबलभृगुवर्यस्य शमनम् ।
विहारं गार्हस्थ्यं तदनु भजमानं सुविमलं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ २॥
गुरोराज्ञां नीत्वा वनमनुगतं दारसहितं
ससौमित्रिं त्यक्त्वेप्सितमपि सुराणां नृपसुखम् ।
विरुपाद्राक्षस्याः प्रियविरहसन्तापमनसं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ३॥
विराधं स्वर्नीत्वा तदनु च कबन्धं सुररिपुं
गतं पम्पातीरे पवनसुतसम्मेलनसुखम् ।
गतं किष्किन्धायां विदितगुणसुग्रीवसचिवं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ४॥
प्रियाप्रेक्षोत्कण्ठं जलनिधिगतं वानरयुतं
जले सेतुं बद्ध्वाऽसुरकुल निहन्तारमनघम् ।
विशुद्धामर्धाङ्गीं हुतभुजि समीक्षन्तमचलं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ५॥
विमानं चारुह्याऽनुजजनकजासेवितपद
मयोध्यायां गत्वा नृपपदमवाप्तारमजरम् ।
सुयज्ञैस्तृप्तारं निजमुखसुरान् शान्तमनसं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ६॥
प्रजां संस्थातारं विहितनिजधर्मे श्रुतिपथं
सदाचारं वेदोदितमपि च कर्तारमखिलम् ।
नृषु प्रेमोद्रेकं निखिलमनुजानां हितकरं
सतीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ७॥
तमः कीर्त्याशेषाः श्रवणगदनाभ्यां द्विजमुखास्तरिष्यन्ति
ज्ञात्वा जगति खलु गन्तारमजनम् ॥
अतस्तां संस्थाप्य स्वपुरमनुनेतारमखिलं
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥ ८॥
रघुनाथाष्टकं हृद्यं रघुनाथेन निर्मितम् ।
पठतां पापराशिघ्नं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ९॥
॥ इति पण्डित श्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रि विरचितं श्रीरघुनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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