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पारंपरिक पाठ

स्वरूपानुसन्धानाष्टकम्

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तपोयज्ञदानादिभिः शुद्धबुद्धि-

र्विरक्तो नृपादेः पदे तुच्छबुद्ध्या .

परित्यज्य सर्वं यदाप्नोति तत्त्वं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. १..

दयालुं गुरुं ब्रह्मनिष्ठं प्रशान्तं

समाराध्य मत्या विचार्य स्वरूपम् .

यदाप्नोति तत्त्वं निदिध्यास विद्वान्-

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. २..

यदानन्दरूपं प्रकाशस्वरूपं

निरस्तप्रपञ्चं परिच्छेदहीनम् .

अहंब्रह्मवृत्त्यैकगम्यं तुरीयं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ३..

यदज्ञानतो भाति विश्वं समस्तं

विनष्टं च सद्यो यदात्मप्रबोधे .

मनोवागतीतं विशुद्धं विमुक्तं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ४..

निषेधे कृते नेति नेतीति वाक्यैः

समाधिस्थितानां यदाभाति पूर्णम् .

अवस्थात्रयातीतमद्वैतमेकं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ५..

यदानन्दलेशैः समानन्दि विश्वं

यदाभाति सत्त्वे तदाभाति सर्वम् .

यदालोकने रूपमन्यत्समस्तं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ६..

अनन्तं विभुं निर्विकल्पं निरीहं

शिवं सङ्गहीनं यदोङ्कारगम्यम् .

निराकारमत्युज्ज्वलं मृत्युहीनं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ७..

यदानन्द सिन्धौ निमग्नः पुमान्स्या-

दविद्याविलासः समस्तप्रपञ्चः .

तदा नः स्फुरत्यद्भुतं यन्निमित्तं

परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमस्मि .. ८..

स्वरूपानुसन्धानरूपां स्तुतिं यः

पठेदादराद्भक्तिभावो मनुष्यः .

श्रुणोतीह वा नित्यमुद्युक्तचित्तो

भवेद्विष्णुरत्रैव वेदप्रमाणात् .. ९..

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य

श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य

श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ

स्वरूपानुसन्धानाष्टकम् संपूर्णम् ..

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