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विष्णु और कृष्ण

अच्युताष्टकम् (श्रीधरवेङ्कटेशकृतम्)

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अभिलपननिसर्गादच्युताख्ये भजे त्वां

हरसि मदघबृन्दं त्वद्भुबुक्षावशात् त्वम् ।

अघहृदिति तवाम्ब प्रत्युत ख्यातिदोऽहं

त्वयि मम वद का वा सङ्गतिर्दैन्यवाचाम् ॥ १॥

चिरातीता सान्दीपनितनुभुवः कालभवन-

प्रपत्तिस्तं पित्रोः पुनरगमयत् सन्निधिमिति ।

यशः कृष्णस्येदं कथमहह न त्वां रसनया

यदि श्रीकृष्णाख्ये भजति स तादनीं मुनिसुतः ॥ २॥

हरेर्यच्चोरत्वं यदपि च तथा जारचरितं

तदेतत् सर्वांहस्ततिकृते सङ्कथनतः ।

इतीदं माहात्म्यं मधुमथन ते दीपितमिदं

वदन्त्याः कृष्णाख्ये तवहि विचरन्त्या विलसितम् ॥ ३॥

सभायां द्रौपत्याऽंशुकसृतिभिया तद्रसनया

धृता तस्याश्चेलं प्रतनु तदवस्थं विदधती ।

व्यतानीश्शैलाभं वसनविसरं चाम्ब हरता-

मियान् गोविन्दाख्ये वद वसनराशिस्तव कुतः ॥ ४॥

अधिरसनमयि त्वामच्युताख्ये दधानं

वनजभवमुखानां वन्द्यमाहुर्महान्तः ।

सतु विनमति मातश्चाश्वगोश्वादनादीन्

भवति ननु विचित्रा पद्धतिस्तावकानाम् ॥ ५॥

जननि मुरभिदाख्ये जाह्नवीनिम्नगैका

समजनि पदपद्माच्चक्रिणस्त्वाश्रितानाम् ।

परिणमति समस्ताः पादवार्घिन्दुरेको

जगति ननु तटिन्यो जाह्नवीसह्यजाद्याः ॥ ६॥

समवहितमपश्यन् सन्निधौ वैनतेयं

प्रसभविधुतपद्मापाणिरीशोऽच्युताख्ये ।

समवितुमुपनीतः सागजेन्द्रं त्वया द्राक्

वद जननि विना त्वां केन वा किं तदाभूत् ॥ ७॥

यदेष स्तौमि त्वां त्रियुगचरणत्रायिणि ततो

महिम्नः का हानिस्तवतु मम सम्पन्निरवधिः ।

शुना लीलाकामं भवति सुरसिन्धुर्भगवती

तदेषा किम्भूता सतु सपदि सन्तापभरितः ॥ ८॥

इति श्रीश्रीधरवेङ्कटेशार्यकृतौ अच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ॥

स्रोत, लाइसेंस और पाठ सूचना

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