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पारंपरिक पाठ

अवधूताष्टकम्

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श्री परमात्मने नमः ॥

अथ परमहंस शिरोमणि-अवधूत-श्रीस्वामीशुकदेवस्तुतिः

निर्वासनं निराकाङ्क्षं सर्वदोषविवर्जितम् ।

निरालम्बं निरातङ्कं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १॥

निर्ममं निरहङ्कारं समलोष्टाश्मकाञ्चनम् ।

समदुःखसुखं धीरं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ २॥

अविनाशिनमात्मानं ह्येकं विज्ञाय तत्वतः ।

वीतरागभयक्रोधं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ३॥

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।

एवं विज्ञाय सन्तुष्टम् ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ४॥

समस्तं कल्पनामात्रं ह्यात्मा मुक्तः सनातनः ।

इति विज्ञाय सन्तुष्टं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ५॥

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं कामसङ्कल्पवर्जितम् ।

हेयोपादेयहीनं तं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ६॥

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः ।

वीतशोकं निरायासं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ७॥

आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ ।

उदासीनं सुखासीनं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ८॥

स्वभावेनैव यो योगी सुखं भोगं न वाञ्छति ।

यदृच्छालाभसन्तुष्टं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ९॥

नैव निन्दाप्रशंसाभ्यां यस्य विक्रियते मनः ।

आत्मक्रीडं महात्मानं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १०॥

नित्यं जाग्रदवस्थायां स्वप्नवद्योऽवतिष्ठते ।

निश्चिन्तं चिन्मयात्मानं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ ११॥

द्वेष्यं नास्ति प्रियं नास्ति नास्ति यस्य शुभाशुभम् ।

भेदज्ञानविहीनं तं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १२॥

जडं पश्यति नो यस्तु जगत् पश्यति चिन्मयम् ।

नित्ययुक्तं गुणातीतं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १३॥

यो हि दर्शनमात्रेण पवते भुवनत्रयम् ।

पावनं जङ्गमं तीर्थं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १४॥

निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निर्मलं परमामृतम् ।

अनन्तं जगदाधारं ह्यवधूतं नमाम्यहम् ॥ १५॥

॥ इति अवधूताष्टकं समाप्तम् ॥

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