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पारंपरिक पाठ

कात्यायन्यष्टकम्

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श्रीगणेशाय नमः ।

अवर्षिसञ्ज्ञं पुरमस्ति लोके कात्यायनी तत्र विराजते या ।

प्रसाददा या प्रतिभा तदीया सा छत्रपुर्यां जयतीह गेया ॥ १॥

त्वमस्य भिन्नैव विभासि तस्यास्तेजस्विनी दीपजदीपकल्पा ।

कात्यायनी स्वाश्रितदुःखहर्त्री पवित्रगात्री मतिमानदात्री ॥ २॥

ब्रह्मोरुवेतालकसिंहदाढोसुभैरवैरग्निगणाभिधेन ।

संसेव्यमाना गणपत्यभिख्या युजा च देवि स्वगणैरिहासि ॥ ३॥

गोत्रेषु जातैर्जमदग्निभारद्वाजाऽत्रिसत्काश्यपकौशिकानाम् ।

कौण्डिन्यवत्सान्वयजैश्च विप्रैर्निजैर्निषेव्ये वरदे नमस्ते ॥ ४॥

भजामि गोक्षीरकृताभिषेके रक्‍ताम्बरे रक्‍तसुचन्दनाक्‍ते ।

त्वां बिल्वपत्रीशुभदामशोभे भक्ष्यप्रिये हृत्प्रियदीपमाले ॥ ५॥

खड्गं च शङ्खं महिषासुरीयं पुच्छं त्रिशूलं महिषासुरास्ये ।

प्रवेशितं देवि करैर्दधाने रक्षानिशं मां महिषासुरघ्ने ॥ ६॥

स्वाग्रस्थबाणेश्वरनामलिङ्गं सुरत्‍नकं रुक्ममयं किरीट्म ।

शीर्षे दधाने जय हे शरण्ये विद्युत्प्रभे मां जयिनं कुरूष्व ॥ ७॥

नेत्रावतीदक्षिणपार्श्वसंस्थे विद्याधरैर्नागगणैश्च सेव्ये ।

दयाघने प्रापय शं सदास्मान्मातर्यशोदे शुभदे शुभाक्षि ॥ ८॥

इदं कात्यायनीदेव्याः प्रसादाष्टकमिष्टदम् ।

कुमठाचार्यजं भक्‍त्या पठेद्यः स सुखी भवेत् ॥ ९॥

॥ इति श्रीकात्यायन्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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