शिक्षाष्टकम्
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रचयिता- चैतन्य महाप्रभु (१४८६-१५३४) चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम् श्रेयः कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू जीवनम् । आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम् ॥१॥ नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्ति-स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥ तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥ न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥ अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥ नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥ युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् । शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥ आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥८॥
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