श्रीहर्यष्टकम्
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हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः ।
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ।।
स गङ्गा स गया सेतुः स काशी स च पुष्करम् ।
जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिशारण्य एव च ।
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
गवां कोटिसहस्राणि हेमकन्यासहस्रकम् ।
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
ॠग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः ।
अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
अश्वमेधैर्महायज्ञैः नरमेधैस्तथैव च ।
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिनाशनम् ।
दुःखात्यन्त परित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
बद्धपरिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।।
हर्यष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
आयुष्यं बलमारोग्यं यशो वृद्धिश्श्रियावहम् ।।
प्रह्लादेन कृतं स्तोत्रं दुःखसागरशोषणम् ।
यः पठेत्स नरो याति तद्विष्णोः परमं पदम् ।।
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