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दत्तात्रेय

मन्त्रगर्भश्रीदत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

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मन्त्रगर्भश्रीदत्तात्रेयाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् दत्तात्रेयस्तोत्राणि [[लेखकः :|]]

ओंकारतत्त्वरूपाय दिव्यज्ञानात्मने नमः । नभोतीतमहाधाम्न ऐंद्र्यृध्या ओजसे नमः ॥ १॥

नष्टमत्सरगम्यायागम्याचारात्मवर्त्मने । मोचितामेध्यकृतये ऱ्हींबीजश्राणितश्रिये ॥ २॥

मोहादिविभ्रमान्ताय बहुकायधराय च । भत्तदुर्वैभवछेत्रे क्लींबीजवरजापिने ॥ ३॥

भवहे तुविनाशाय राजच्छोणाधराय च । गतिप्रकम्पिताण्डाय चारुव्यहतबाहवे ॥ ४॥

गतग र्वप्रियायास्तु यमादियतचेतसे । वशिताजातवश्याय मुण्डिने अनसूयवे ॥ ५॥

वदद्व रेण्यवाग्जालाविस्पृष्टविविधात्मने । तपोधनप्रसन्नायेडापतिस्तुतकीर्तये ॥ ६॥

तेजोमण्यन्तरङ्गायाद्मरसद्मविहापने । आन्तरस्थानसंस्थायायैश्वर्यश्रौतगीतये ॥ ७॥

वातादिभययुग्भावहेतवे हेतुबेतवे । जगदात्मात्मभूताय विद्विषत्षट्कघातिने ॥ ८॥

सुरवर्गोद्धृते भृत्या असुरावासभेदिने । नेत्रे च नयनाक्ष्णे चिच्चेतनाय महात्मने ॥ ९॥

देवाधिदेवदेवाय वसुधासुरपालिने । याजिनामग्रगण्याय द्रांबीजजपतुष्टये ॥ १०॥

वासनावनदावाय धूलियुग्देहमालिने । यतिसंन्यासिगतये दत्तात्रेयेति संविदे ॥ ११॥

यजनास्यभुजेजाय तारकावासगामिने । महाजवास्पृग्रूपायात्ताकाराय विरूपिणे ॥ १२॥

नराय धीप्रदीपाय यशस्वियशसे नमः । हारिणे चोज्वलाङ्गायात्रेस्तनूजाय सम्भवे ॥ १३॥

मोचितामरसङ्घाय धीमतां धीरकाय च । बलिष्ठविप्रलभ्याय यागहोमप्रियाय च ॥ १४॥

भजन्महिमविKयात्रेऽमरारिमहिमच्छिदे । लाभाय मुण्डिपूज्याय यमिने हेममालिने ॥ १५॥

गतोपाधिव्याधये च हिरण्याहितकान्तये । यतीन्द्रचर्यां दधते नरभावौषधाय च ॥ १६॥

वरिष्ठयोगिपूज्याय तन्तुसन्तन्वते नमः । स्वात्मगाथासुतीर्थाय मःश्रिये षट्कराय च ॥ १७॥

तेजोमयोत्तमाङ्गाय नोदनानोद्यकर्मणे । हान्याप्तिमृतिविज्ञात्र ओंकारितसुभक्तये ॥ १८॥

रुक्षुङ्मनःखेदहृते दर्शनाविषयात्मने । रांकवाततवस्त्राय नरतत्त्वप्रकाशिने ॥ १९॥

द्रावितप्रणताघायात्तःस्वजिष्णुःस्वराशये । राजन्त्र्यास्यैकरूपाय मःस्थायमसुबम्धवे ॥ २०॥

यतये चोदनातीत प्रचारप्रभवे नमः । मानरोषविहीनाय शिष्यसंसिद्धिकारिणे ॥ २१॥

गङ्गे पादविहीनाय चोदनाचोदितात्मने । यवीयसेऽलर्कदुःखवारिणेऽखण्डितात्मने ॥ २२॥

ऱ्हींबीजायार्जुनज्येष्ठाय दर्शनादर्शितात्मने । नतिसन्तुष्टचित्ताय यतिने ब्रह्मचारिणे ॥ २३॥

इत्येष सत्स्तवो वृत्तोयात् कं देयात्प्रजापिने । मस्करीशो मनुस्यूतः परब्रह्मपदप्रदः ॥ २४॥

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