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शिव

शङ्कराचार्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

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श्री शङ्कराचार्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्रीशङ्कराचार्यवर्यो ब्रह्मानन्दप्रदायकः ।

अज्ञानतिमिरादित्यस्सुज्ञानाम्बुधिचन्द्रमाः ।। १।।

वर्णाश्रमप्रतिष्ठाता श्रीमान्मुक्तिप्रदायकः ।

शिष्योपदेशनिरतो भक्ताभीष्टप्रदायकः ।। २।।

सूक्ष्मतत्त्वरहस्यज्ञः कार्याकार्यप्रबोधकः ।

ज्ञानमुद्राञ्चितकरश्-शिष्यहृत्तापहारकः ।। ३।।

परिव्राजाश्रमोद्धर्ता सर्वतन्त्रस्वतन्त्रधीः ।

अद्वैतस्थापनाचार्यस्साक्षाच्छङ्कररूपभृत् ।। ४।।

षन्मतस्थापनाचार्यस्त्रयीमार्ग प्रकाशकः ।

वेदवेदान्ततत्त्वज्ञो दुर्वादिमतखण्डनः ।। ५।।

वैराग्यनिरतश्शान्तस्संसारार्णवतारकः ।

प्रसन्नवदनाम्भोजः परमार्थप्रकाशकः ।। ६।।

पुराणस्मृतिसारज्ञो नित्यतृप्तो महाञ्छुचिः ।

नित्यानन्दो निरातंको निस्संगो निर्मलात्मकः ।। ७।।

निर्ममो निरहङ्कारो विश्ववन्द्यपदाम्बुजः ।

सत्त्वप्रधानस्सद्भावस्सङ्ख्यातीतगुणोज्ज्वलः ।। ८।।

अनघस्सारहृदयस्सुधीसारस्वतप्रदः ।

सत्यात्मा पुण्यशीलश्च साङ्ख्ययोगविलक्षणः ।। ९।।

तपोराशिर् महातेजो गुणत्रयविभागवित् ।

कलिघ्नः कालकर्मज्ञस्तमोगुणनिवारकः ।। १०।।

भगवान्भारतीजेता शारदाह्वानपण्दितः ।

धर्माधर्मविभावज्ञो लक्ष्यभेदप्रदर्शकः ।। ११।।

नादबिन्दुकलाभिज्ञो योगिहृत्पद्मभास्करः ।

अतीन्द्रियज्ञाननिधिर्नित्यानित्यविवेकवान् ।। १२।।

चिदानन्दश्चिन्मयात्मा पर्कायप्रवेशकृत् ।

अमानुषचरित्राढ्यः क्षेमदायी क्षमाकरः ।। १३।।

भव्यो भद्रप्रदो भूरि महिमा विश्वरञ्जकः ।

स्वप्रकाशस्सदाधारो विश्वबन्धुश्शुभोदयः ।। १४।।

विशालकीर्तिर्वागीशस्सर्वलोकहितोत्सुकः ।

कैलासयात्रसंप्राप्त चन्द्रमौलिप्रपूजकः ।। १५।।

कांच्यां श्रीचक्र राजख्य यन्त्र स्थापन दीक्षितः ।

श्रीचक्रात्मक ताटङ्क तोषिताम्बा मनोरथः ।। १६।।

ब्रह्मसूत्रोपनिषद्भाष्यादिग्रन्थकल्पकः ।

चतुर्दिक्चतुराम्नायप्रतिष्ठाता महामतिः ।। १७।।

द्विसप्तति मतोच्छेत्ता सर्वदिग्विजयप्रभुः ।

काषायवसनोपेतो भस्मोद्धूळितविग्रहः ।। १८।।

ज्ञानत्मकैकदण्डाढ्यः कमण्डलुलसत्करः ।

गुरुभूमण्डलाचार्यो भगवत्पादसंज्ञकः ।। १९।।

व्याससंदर्शनप्रीतः ऋष्यशृङ्गपुरेश्वरः ।

सौन्दर्यलहरी मुख्य बहुस्तोत्र विधायकः ।। २०।।

चतुष्षष्टिकलाभिज्ञो ब्रह्मराक्षसपोषकः ।

श्रीमन्मण्डनमिश्राख्यस्वंभूजयसन्नुतः ।। २१।।

तोटकाचार्यसम्पूज्य पद्मपादर्चिताङ्घ्रिकः ।

हस्तामलयोगिन्द्र ब्रह्मज्ञानप्रदायकः ।। २२।।

सुरेश्वराख्य सच्छिष्य सन्यासाश्रम दायकः ।

नृसिंहभक्तस्सद्रत्नगर्भहेरम्बपूजकः ।। २३।।

व्याख्यसिंहासनाधीशो जगत्पूज्यो जगद्गुरुः ।

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यसर्वलोकगुरोः परम् ।। २४।।

नाम्नामष्टोत्तरशतं भुक्तिमुक्तिफलप्रदं ।

त्रिसन्ध्यं यः पठेद्भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।।

।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ।

स्रोत, लाइसेंस और पाठ सूचना

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