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पारंपरिक पाठ

अपराधक्षमापनस्तोत्रम्

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अपराधक्षमापनस्तोत्रम् दत्तात्रेयस्तोत्राणि वासुदेवानन्दसरस्वती

रसज्ञावशातारकं स्वादुलभ्यम्

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ १॥

वियोन्यन्तरे दैवदार्ढ्या विभोप्राग्

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ २॥

मया मातृगर्भस्थितिप्राप्तकष्टात्

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ३॥

मया जातमात्रेण संमोहितेन

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ४॥

मया क्रीडनासक्तचित्तेन बाल्ये

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ५॥

मया यौवनेऽज्ञानतो भोगतोषाद्

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ६॥

मया स्थाविरेनिघ्नसर्वेन्द्रियेण

गृहीतं कदाचिन्न ते नाम दत्त ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ७॥

हृषीकेश मे वाङ्मनःकायजातम्

हरेज्ञानतोऽज्ञानतो विश्वसाक्षिन् ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ८॥

स्मृतो ध्यात आवाहितोऽस्यर्चितो वा

न गीतः स्तुतो वन्दितो वा न जप्तः ।

क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं

क्षमस्वापराधं प्रभो क्लिन्नचित्त ॥ ९॥

दयाब्धिर्भवाद्दङ्न सागाश्च मादृग्

भवत्यात्पमन्तोर्भवान्मे शरण्यः ।

यथालम्बनं भूर्हि भूनिःसृतांघ्रे

रिति प्रार्थितं दत्तशिष्येण सारम् ॥ १०॥

॥ इति परमपूज्य श्रीमद् वासुदेवानन्दसरस्वती

स्वामीमहाराजकृत अपराधक्षमापन स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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