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पारंपरिक पाठ

श्री सुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम्

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श्री सुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम् [[लेखकः :|]]

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षडाननं चन्दनलेपिताङ्गं महोरसं दिव्यमयूरवाहनम् । रुद्रस्य सूनुं सुरलोकनाथं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥१॥

जाज्वल्यमानं सुरवृन्दवन्द्यं कुमार धारातट मन्दिरस्थम् । कन्दर्परूपं कमनीयगात्रं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥२॥

द्विषड्भुजं द्वादशदिव्यनेत्रं त्रयीतनुं शूलमसी दधानम् । शेषावतारं कमनीयरूपं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥३॥

सुरारि घोराहवशोभमानं सुरोत्तमं शक्तिधरं कुमारम् । सुधार शक्त्यायुध शोभिहस्तं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥४॥

इष्टार्थसिद्धिप्रदमीशपुत्रं मिष्टान्नदं भूसुर कामधेनुम् । गङ्गोद्भवं सर्वजनानुकूलं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥५॥

यः श्लोकपञ्चमिदं पठतीह भक्त्या ब्रह्मण्यदेव विनिवेशित मानसः सन् । प्राप्नोति भोगमखिलं भुवि यद्यदिष्ट- मन्ते स गच्छति मुदा गुहसाम्यमेव ॥

॥ इति श्री सुब्रह्मण्यपञ्चरत्नं समाप्तम् ॥

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श्री सुब्रह्मण्यपञ्चरत्नम् — sa.wikisource.org contributors

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