वैराग्यपञ्चकम्
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क्षोणी कोण शतांश पालन कला दुर्वार गर्वानल-
क्षुभ्यत्क्षुद्र नरेन्द्र चाटु रचना धन्यान् न मन्यामहे |
देवं सेवितुमेव निश्चिनुमहे योऽसौ दयालुः पुरा
धाना मुष्टिमुचे कुचेल मुनये दत्ते स्म वित्तेशताम् ||१ ||
शिलं किमनलं भवेदनलमौदरं बाधितुं
पयः प्रसृति पूरकं किमु न धारकं सारसम् |
अयत्न मल मल्लकं पथि पटच्चरं कच्चरं
भजन्ति विबुधा मुधा ह्यहह कुक्षितः कुक्षितः ||२ ||
ज्वलतु जलधि क्रोड क्रीडत्कृपीड भव प्रभा-
प्रतिभट पटु ज्वाला मालाकुलो जठरानलः |
तृणमपि वयं सायं संफुल्ल मल्लि मतल्लिका
परिमलमुचा वाचा याचामहे न महीश्वरान् ||३ ||
दुरीश्वर द्वार बहिर्वितर्दिका-
दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः |
यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे
धनञ्जय स्यन्दन भूषणं धनम् ||४ ||
शरीर पतनावधि प्रभु निषेवणापादनात्
अबिन्धन धनञ्जय प्रशमदं धनं दन्धनम् |
धनञ्जय विवर्धनं धनमुदूढ गोवर्धनं
सुसाधनमबाधनं सुमनसां समाराधनम् ||५ ||
नास्ति पित्रार्जितं किञ्चिन्न मया किञ्चिदार्जितम् |
अस्ति मे हस्ति शैलाग्रे वस्तु पैतामहं धनम् ||६ ||
||इति वेदान्त देशिकेन रचितं वैरग्यपंचकं सम्पूर्णम् ||
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