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पारंपरिक पाठ

गजेन्द्रमोक्षः

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गजेन्द्रमोक्षः विष्णुस्तोत्राणि [[लेखकः :|]]

श्रीमद्भागवते अष्टमस्कंधे परीक्षित महाराजानां श्री शुकमुनिः उपदेशित गजेंद्रमोक्ष स्तोत्रमिदं

श्री शुक उवाच

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि |

जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितं || १ ||

गजेंद्र उवाच

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकं |

पुरुषायादि बीजाय परेशायाभिधीमहि || २ ||

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं |

योस्मापरस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयंभुवं || ३ ||

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं

क्वचिद्विभातं क्वच तत्तिरोहितं |

अविद्धदृक्साक्ष्यु भयं तदीक्षते

स आत्ममूलोवतु मां परात्परः || ४ ||

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो

लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु |

तमस्तदासीद्गहनं गभीरं

यस्तस्य पारेभिविराजिते विभु || ५ ||

न यस्य देवा ऋषयः

पदंर्विजंतुः कोर्हति गंतुमीरितुं |

यथा नटस्याभिकृतिर्विचेष्टतो

स आत्ममूलोवतु मां परात्परः || ६ ||

दिदृक्षवो यस्यपदं सुमंगळं

विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः |

चरंत्य लोक व्रतमव्रणं वने

भूतात्मभूताः सहृदः स मे गतिः || ७ ||

न विद्यते यस्य च जन्मकर्मवा

न नामरूपे गुणदोष एव वा |

तथापि लोकाप्यय संभवाय यः

स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति || ८ ||

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेनंतशक्तये |

अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे || ९ ||

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने |

नमो गिरां विदूराय मनश्चेतसामपि || १० ||

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता |

नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे || ११ ||

नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे |

निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च || १२ ||

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्य्क्षाय साक्षिणे |

पुरुषायात्म मूलाय मूलप्रकृतये नमः || १३ ||

सर्वेंद्रिय गुणदृष्ट्रे सर्वप्रत्यय हेतवे |

असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः || १४ ||

नमो नमस्तेखिलकारणाय

निष्कारणायाद्भुत कारणाय |

सर्वागमाम्नाय महार्णवाय

नमोपवर्गाय परायणाय || १५ ||

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय

तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय |

नैष्कर्म्य भावेन विवर्जितगम

स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि || १६ ||

मादृक्प्रपन्न पशुपाश विमोक्षणाय

मुक्ताय भूरिकारणाय नमोलयाय |

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत

प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते || १७ ||

आत्मात्मजाप्त गृहवित्तजनेषु सक्तै

र्दुष्प्रापणाय गुणसंग विवर्जिताय |

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय

ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय || १८ ||

यं धर्मार्थ विमुक्तकामा

भजंत इष्टां गतिमाप्नुवंति |

किं त्वाशिषोरात्यपि देहमव्ययं

करोतुमेदभ्रदयो विमोक्षणं || १९ ||

एकांतिनो यस्य न कंचनार्थं

वांछंति ये वै भगवत्प्रपन्नाः |

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगळं

गायंत आनंदसमुद्रमग्नाः || २० ||

तमक्षरं ब्रह्म परं परेशमव्यक्त

माध्यात्मिक योगगम्यं |

अतींद्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर

मनंतमाद्यं परिपूर्णमीडे || २१ ||

यस्य ब्रह्मादयोदेवा वेदा लोकाश्चराचराः |

नामरूप विभेदेन फ़ल्ग्व्या च कलया कृताः || २२ ||

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गर्भस्तयो

निर्यांति संयात्यसुकृत्स्वरोचिषः |

तथा यतोयं गुणसम्प्रवाहो

बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः || २३ ||

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्य

ङ्न स्त्री न षंडो न पुमान्नजंतुः |

नायं गुणः कर्म न सन्नचास

न्निशेधशेषो जयतादशेषः || २४ ||

जिजीविषे नाहमिहमुया

किमंतर्बहिश्चा वृत्तये भयोन्या |

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः

तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षं || २५ ||

सोहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसं |

विश्वात्मानजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परंपदं || २६ ||

योगरंधितकर्मणो हृदि योगविभाविते |

योगिनो यं प्रपश्यंति योगेशं तं नतोस्म्यहं || २७ ||

नमो नमस्तुभ्यसह्यवेगाय

शक्तित्रया याखिलाधि गुणाय |

प्रपन्न पालाय दुरंतशक्तये

कदिंद्रियाणा मनवाप्यवर्त्मने || २८ ||

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्या हंधिया हतं |

तं दुरत्यय माहात्म्यं भगवंतमितोस्म्यहं || २९ ||

श्री शुक उवाच

एवं गजेंद्रमुपवर्णित निर्विशेषं

ब्रह्मादयो विविध लिंग भिदाभिमानाः |

नैते यदोपसृपुर्निखिलात्मकत्वात्

तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् || ३० ||

तं तद्वतार्त्तमुप्लभ्य जगन्निवासः

स्तोत्रंनिशम्य दिविजैःसह संस्तुवद्भिः |

छंदोमयेन् गरुडेन समुह्यमानो

श्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेंद्रः || ३१ ||

सोंतस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो

दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रं |

उत्क्षिप्य सांबुजकरं गिरिमाह कच्छ्रा

न्नारयणाखिलगुरो भतवन्नमस्ते || ३२ ||

तं वीक्ष्यपीडितमजः सहसावतीर्य

सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जाहारः |

गृहाद्विपाटित मुखादरिणा गजेंद्रं

संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्रियाणां || ३३ ||

|| इति श्रीमद्भागवते अष्टम स्कंधे गजेंद्रमोक्षस्तोत्रन्नाम तृतीयोध्याय संपूर्णः ||

|| श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

स्रोत, लाइसेंस और पाठ सूचना

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