हस्तामलकस्तोत्रम्
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<poem> ।।हस्तामलक स्तोत्रम ।।
कस्त्वं शिशो कस्य कुतोऽसि गन्ता किं नाम ते त्वं कुत आगतोऽसि । एतन्मयोक्तं वद चार्भक त्वं मत्प्रीतये प्रीतिविवर्धनोऽसि ।।१।।
हस्तामलक उवाच ।
नाहं मनुष्यो न च देव- यक्षौ न ब्राह्मण- क्षत्रिय- वैश्य- शूद्राः । न ब्रह्मचारी न गृही वनस्थो भिक्षुर्न चाहं निजबोध रूपः ।।२।।
निमित्तं मनश्चक्षुरादि प्रवृत्तौ निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः । रविर्लोकचेष्टानिमित्तं यथा यः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।३।।
यमग्न्युष्णवन्नित्यबोध स्वरूपं मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि । प्रवर्तन्त आश्रित्य निष्कम्पमेकं स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।४।।
मुखाभासको दर्पणे दृश्यमानो मुखत्वात् पृथक्त्वेन नैवास्ति वस्तु । चिदाभासको धीषु जीवोऽपि तद्वत् स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।५।।
यथा दर्पणाभाव आभासहानौ मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम् । तथा धी वियोगे निराभासको यः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।६।।
मनश्चक्षुरादेर्वियुक्तः स्वयं यो मनश्चक्षुरादेर्मनश्चक्षुरादिः । मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।७।।
य एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः प्रकाशस्वरूपोऽपि नानेव धीषु शरावोदकस्थो यथा भानुरेकः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।८।।
यथाऽनेकचक्षुः- प्रकाशो रविर्न क्रमेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम् । अनेका धियो यस्तथैकः प्रबोधः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।९।।
विवस्वत प्रभातं यथा रूपमक्षं प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान् । यदाभात आभासयत्यक्षमेकः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा।।१०।।
यथा सूर्य एकोऽप्स्वनेकश्चलासु स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्यस्वरूपः चलासु प्रभिन्नासुधीष्वेक एव स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।११।।
घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कम् यथा निष्प्रभं मन्यते चातिमूढः । तथा बद्धवद्भाति यो मूढ- दृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।१२।।
समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेकं समस्तानि वस्तूनि यन्न स्पृशन्ति । वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपं स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।१३।।
उपाधौ यथा भेदता सन्मणीनां तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपि । यथा चन्द्रिकाणां जले चञ्चलत्वं तथा चञ्चलत्वं तवापीह विष्णो ।।१४।।
।।इति श्रीमद् शङ्कराचार्यकृत
हस्तामलकसंवादस्तोत्रं संपूर्णम् ।।
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