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पारंपरिक पाठ

मनीषापञ्चकम्

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||मनीषापञ्चकं ||

मनीषापञ्चकं

अन्नमयादन्नमयमथवा चैतन्यमेव चैतन्यात् |

यतिवर दूरीकर्तुं वाञ्छसि किं ब्रूहि गच्छ गच्छेति ||

प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरङ्गसहजानन्दावबोधाम्बुधौ

विप्रोऽयं श्वपचोऽयमित्यपि महान्कोऽयं विभेदभ्रमः |

किं गङ्गाम्बुनि बिम्बितेऽम्बरमणौ चाण्डालवीथीपयः

पूरे वाऽन्तरमस्ति काञ्चनघटीमृत्कुम्भयोर्वाऽम्बरे ||

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते

या ब्रह्मादिपिपीलिकान्ततनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी |

सैवाहं न च दृश्यवस्त्विति दृढप्रज्ञापि यस्यास्ति चे-

च्चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ||१||

ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं

सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाऽशेषं मया कल्पितम् |

इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले

चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ||२||

शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरो-

र्नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याजशान्तात्मना |

भूतं भाति च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके

प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ||३||

या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते

यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतोऽचेतनाः |

तां भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय-

न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ||४||

यत्सौख्याम्बुधिलेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता

यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः |

यस्मिन्नित्यसुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्

यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ||५||

दासस्तेऽहं देहदृष्ट्याऽस्मि शंभो

जातस्तेंऽशो जीवदृष्ट्या त्रिदृष्टे |

सर्वस्याऽऽत्मन्नात्मदृष्ट्या त्वमेवे-

त्येवं मे धीर्निश्चिता सर्वशास्त्रैः ||

||इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ मनीषापञ्चकं संपूर्णम् ||

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