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पारंपरिक पाठ

श्रीव्यंकटेशस्तोत्रम्

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श्रीव्यंकटेशस्तोत्रम् श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती

||श्रीव्यंकटेशस्तोत्रम् ||

यो लोकरक्षार्थमिहावतीर्य वैकुंठलोकात्सुरवर्यवर्यः।।

शेषाचले तिष्ठति योsनवद्ये तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।१।।

पद्मावतीमानसराजहंसः कृपाकटाक्षानुगृहीतहंसः।।

हंसात्मनादिष्टनिजस्वभावस्तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।२।।

महाविभूतिः स्वयमेव यस्य पदारविंदं भजते चिरस्य।।

तथापि योsर्थं भुवि संचिनोति तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।३।।

य आश्विने मासि महोत्सवार्थं शेषाद्रिमारुह्य मुदातितुंगम्।।

यत्पादमीक्षन्ति तरन्ति ते वै तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।४।।

प्रसीद लक्ष्मीरमण प्रसीद प्रसीद शेषाद्रिशय प्रसीद।।

दारिद्र्यदुःखादिभयं हरस्व तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।५।।

यदि प्रमादेन कृतोsपराधः श्रीव्यंकटेशाच्छितलोकबाधः।।

स मामव त्वं प्रणमामि भूयस्तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।६।।

न मत्समो यद्यपि पातकीह न त्वत्समः कारुणिकोsपि चेह।।

विज्ञापितं मे शृणु शेषशायिन् तं व्यंकटेशं शरणं प्रपद्ये।।७।।

व्यंकटेशाष्टकमिदं त्रिकालं यः पठेन्नरः।

स सर्वपापनिर्मुक्तो व्यंकटेशप्रियो भवेत्।।८।।

इति श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीव्यंकटेशस्तोत्रं संपूर्णम्।।

स्रोत, लाइसेंस और पाठ सूचना

श्रीव्यंकटेशस्तोत्रम् — sa.wikisource.org contributors

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