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पारंपरिक पाठ

प्रज्ञाविवर्धन स्तोत्र

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प्रज्ञाविवर्धन स्तोत्र 🌷

प्रज्ञाविवर्धन स्तोत्र [[लेखकः :|]]

अस्य श्रीप्रज्ञाविवर्धन-स्तोत्र-मंत्रस्य सनत्कुमारऋषि:।

स्वामी कार्तिकेयो देवता। अनुष्टुप् छंद:।

मम सकल विद्यासिद्ध्यर्थं जपे विनियोग:।

श्रीस्कंद उवाच।।

योगीश्वरो महासेन: कार्तिकेयोSग्निनन्दन:।

स्कंद:कुमार: सेनानी: स्वामिशंकरसंभव: ।।१।।

गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वज:।

तारकारिरुमापुत्र: क्रौंचारिश्च षडानन: ।।२।।

शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्ध:सारस्वतो गुह:।

सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रद: ।।३।।

शरजन्मा गणाधीशपूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्।

सर्वागमप्रणेताच वांछितार्थप्रदर्शन: ।।४।।

अष्टाविंशति नामानि मदीयानीति य: पठेत्।

प्रत्यूषं श्रद्धयायुक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ।।५।।

महामंत्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम्।

महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।६।।

|| इति श्री प्रज्ञाविवर्धन स्तोत्रं संपूर्णम् ||

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प्रज्ञाविवर्धन स्तोत्र — sa.wikisource.org contributors

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