दुर्गास्तुतिः
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<poem> नमामि देवीं कमलायताक्षीं सुरेन्द्रबृन्दादि नतांघ्रियुग्माम् । समुन्नताशेषसुरप्रपालिनीं नमामि दुर्गां दुरितापहन्त्रीम् ।। १ ।।
किरीटकोट्युल्लिखिताब्जपादां मनोजवां तां परमेशभामिनीम् । शशांकरेखान्वितमस्तकाग्रां सुरेश्वरीं तां प्रणमामि दुर्गाम् ।। २ ।।
मूलश्रीभैरवात्मत्रिविधपदमहादेवताभिः परीते दिव्ये सिंहासनेन्द्रे स्थितमखिलकलाबोधकं देशिकेशम् । तस्याङ्के सन्निषण्णामरुणरुचिचया रञ्जिताशावकाशां देवीमानन्दपूर्णाममृतकरतलामाश्रयेऽभीष्टसिद्ध्यै ।। ३ ।।
कल्पान्तानलकोटिकोटिसदृशं घोरं त्रिशूलायुधं पाणिभ्यां परिगृह्य पञ्चवदनस्कन्धेऽधिरुह्य स्थिताम् । विश्वासावृतवीरशक्तिविविधक्रीडाविशेषारवैः तत्तत्क्षुद्रसमस्तशत्रुनिवहां वन्दे महाशूलिनीम् ।। ४ ।।
भासाकुन्दशशाङ्कशंखसदृशां कण्ठीरवाध्यासिनीं कोदाण्डेषुकपालपुस्तकजपस्रक् शूलदानाभयाम् । सर्वेशीं निखिलाघसंघशमनीं भक्तानुकम्पापरां देवीं विश्वमनोरथैकवरदां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ।। ५ ।।
मेघश्यामलकोमलां स्मितमुखीं सिंहासनां शाङ्करीं चापज्योद्गतवारुणास्त्रगलितैरापूरिताशाष्टकैः । तोयैर्भक्तविरुद्धसैनिकगणं संस्तम्भयन्त्यन्वहं विश्वाकारनियापनं विदधतीं ध्यायेन्महाशूलिनीम् ।। ६ ।।
आरुह्य सिंहमसिखेटरथाङ्गशंख- चापेष्वभीतिवरदाङ्कुशपाशहस्ता । पथ्यग्रतस्सकलवैरिमदापहय गच्छानिशं विजयशूलिनि विश्वभूत्यै ।। ७ ।।
विश्वज्योतिप्रकाशे विविधतनुमये विश्वहृत्पद्मवासे विश्वव्यापारभेदानुगुणविविधैर्विश्वशिक्षैकदक्षे । विश्वद्रोहं क्षमस्वाखिलविधदुरितं नाशयत्वाशु शश्वत् त्राहि श्रीशूलिनीशे सहजकरुणया सन्ततं सन्निधेहि ।। ८ ।। <poem>
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