शारदापञ्चरत्नस्तुतिः
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विद्यामुद्राक्षमालाऽमृतकलशकरा कोटिसूर्यप्रकाशा
जाया पद्मोफ़्भवस्य प्रणतजनततेः सर्वमिष्टं दिशन्ती ।
इन्द्रोपेन्द्रादिवन्द्या त्रिभुवनजननी वाक्सवित्री शरण्या
सेयं श्रीशारदाम्बां सकलसुखकरी मङ्गलानि प्रदद्यात् ॥
॥ इति ध्यानम्॥
श्रीमच्छङ्करदेशिकेन्द्ररचिते तुङ्गापगातीरगे
शृङ्गेर्याख्यपुरस्थिते सुविमले सन्मौनिसंसेविते ।
पीठे तां रविकोटिदीप्तिसहितां राराजमानां शिवां
राजीवाक्षमुखामरार्चितपदां वन्दे सदा शारदाम् ॥१॥
पादानम्रजनार्तिनाशनिपुणां नादानुसन्धायिनीं
वेदान्तप्रतिपाद्यमानविभवां वादादिशक्तिप्रदाम् ।
विद्याकल्पलतां चतुर्मुखमुखाम्भोजातसूर्यायितां
विद्यातीर्थगुरूत्तमैरहरहः संसेव्यमानां भजे ॥२॥
ईषत्स्मेरमुखाम्बुजां कुचभरानम्रां त्रिलोकावनीं
दैत्यव्रातविनाशिनीं कुचजितप्रावृट्पयोदां शिवाम् ।
संसारार्णवमग्नदीनजनतासन्तापसन्नाशिनीं
वन्दे तां शुभदामनन्यशरणः स्वान्ते सदा शारदाम् ॥३॥
कारुण्यामृतवारिराशिमनिशं केयूरहारैर्वृतां
कामारेः सहजां कराब्जविलसत्कीरां कुबेरार्चिताम् ।
कामक्रोधमुखारिवर्गशमनीं कैवल्यसम्पत्प्रदां
कञ्जोद्भूतमनः प्रियां हृदि भजे भक्त्या सदा शारदाम् ॥४॥
नित्याऽनित्यविवेकदाननिपुणां स्तुत्यां मुकुन्दादिभिः
यत्याकारशशाङ्कमौलिविनुतां सत्यापितस्वाश्रवाम् ।
नत्या केवलमेव तुष्टहृदयां त्यक्त्वाऽन्यदेवानहं
भक्त्या मे हृदयाम्बुजेऽनवरतं वन्दे सदा शारदाम् ॥५॥
॥ इति श्रीशारदापञ्चरत्नस्तुतिः॥
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