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पारंपरिक पाठ

पुरुषसूक्तम्

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पुरुषसूक्तम् Manish joshi

पुरुषसूक्तम्

|| श्री गणेशाय नम: ||

ॐ तच्छं योरावृणीमहे | गातुं यज्ञाय |

गातुं यज्ञपतये |

दैवी स्वस्तिरस्तु नः | स्वस्तिर्मानुषेभ्यः |

ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम् |

शं नो अस्तु द्विपदे | शं चतुष्पदे ||

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् |

स भूमिं विश्वतो वृत्वाSत्यतिष्ठ्द्दड्गुलम् || १ ||

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् |

उतामृतत्वस्येशानो यद्न्नेनातिरोहति || २ ||

एतावानस्य महिमाSतो ज्यायांश्च पूरुषः |

पादोSस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि || ३ ||

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोSस्येहाभवत्पुनः |

ततो विष्वड्व्यक्रामत्साशनानशने अभि || ४ ||

तस्माद्विराळजायत विराजो अधिपूरुषः |

स जातो अत्यरिच्यत पश्चाभ्दूमिमथो पुरः || ५ ||

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत |

वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धवि: || ६ ||

तं यज्ञं बहिर्षि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः |

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये || ७ ||

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् |

पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये || ८ ||

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे |

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत || ९ ||

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः |

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः || १० ||

यत्पुरुषं व्यदधु: कतिधा व्यकल्पयन् |

मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरु पादा उच्येते || ११ ||

ब्राह्मणोSस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः |

ऊरुतदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत || १२ ||

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षो: सूर्यो अजायत |

मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत || १३ ||

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्षणो द्यौ: समवर्तत |

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँअकल्पयन् || १४ ||

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि: सप्त समिधः कृता: |

देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम् || १५ ||

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् |

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा: || १६ ||

[[वर्गः:स्तोत्रसाहित्यम्] [[Pandit Manish Joshi 9009388133]]

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